प्रशांतमूर्ति, योगी सम्राट आचार्य श्री 108 शांतिसागर जी महाराज

बीसवीं सदी में दिगंबर जैन मुनि परंपरा सम्पूर्ण भारत में कुछ अवरुद्ध सी हो गयी थी। दिगंबर साधना का संदर्शन मात्र मूर्तियों में होता था, या फिर शास्त्रों की गाथाओं में। इस असंभव को उत्तर भारत में आचार्य श्री 108 शांतिसागर जी छाणी ने संभव बनाया ।


प्रशममूर्ति, वात्सल्य वारिधि, बाल ब्रह्मचारी, तपोनिधि संत, उत्तर भारत के प्रथम दिगंबर आचार्य श्री शांतिसागर जी छाणी की जीवनगाथा, आस्था, निष्ठा, साहस और दृढ़ संकल्पों की जीवंत गाथा है। वे इस शताब्दी के ऐसे महान ऋषि थे, जिन्होंने सम्पूर्ण उत्तर भारत को दिगंबर साधना के महत्व से परिचित कराया तथा अपना सम्पूर्ण त्यागमय जीवन स्वात्मबोध के साथ-साथ जन चेतना के परिष्कार को किया समर्पित भी। पूज्यपाद छाणी महाराज ने रत्नत्रयी साधना पथ पर अपने पगचिन्ह उत्कीर्ण किए- पहली बार उत्तर भारत की धरती पर और दिगंबर संत परंपरा को पुनर्जीवित करने के साथ-साथ जन-जन को सम्यक्त्व के दर्शन से परिचित भी कराया।

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