पंथवाद से परे

आचार्य श्री शान्तिसागर जी 'छाणी' और 'दक्षिण' दोनों ही शान्ति के सागर थे। एक बार दोनों आचार्य श्री मुरैना में कई दिनों तक एक साथ रहे। दोनों एक दूसरे की विनय करते थे। छाणी वाले आचार्य श्री तेरहपंथ परम्परा के अनुयायी थे और दक्षिण वाले आचार्य श्री बीसपंथ परम्परा के, तथापि दोनों में मतभेद नहीं था। जब दोनों आचार्य मुरैना से प्रस्थान करने लगे तब दोनों ने समाज को संदेश दिया था कि आज समाज के लोग चाहें बीसपंथ परम्परा को मानें चाहे तेरहपंथ परम्परा को। यह तो उपासना की पद्धतियाँ हैं। इससे सिद्धान्त में कोई अंतर नहीं पड़ता। अतः इन बातों को लेकर समाज में मतभेद या, मनभेद नहीं होना चाहिए।