एक मार्गदर्शक मुनि

सन् 1905 ईसवी में बनारस विद्यालय की स्थापना करके पूज्य गणेशप्रसाद वर्णी ने जैन-विद्या की शिक्षा का जो श्री गणेश किया था, बीस वर्ष बाद उसे बागड़ प्रदेश से लेकर दूर-दूर तक फैलाने में छाणी महाराज का योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण रहा है। उन्होंने जैन समाज की वास्तविक पीड़ा को पहचाना था। अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियाँ ही उस समय अभिशाप के रूप में समाज को कैंसर की तरह खोखला बना रही थीं।

छाणी जी ने अपनी साधना के लिये स्वयं का मार्ग-दर्शन तो किया ही, परन्तु जन-मानस में व्याप्त अनेक कुरीतियों से उबर कर शिक्षा, और खासकर नारी शिक्षा की ओर अग्रसर होने में समाज को भी बड़ी प्रेरणा दी। उन्होंने कई पाठशाला और स्कूलों की नीव रखवाई जिसकी वजह से समाज के अंदर साक्षरता बहुत तेजी से बढ़ी इसके साथ ही उन्होंने अजैनों को मांस-भक्षण का त्याग कराने के लिये भी उन्होंने बड़ा श्रम किया । यही कारण था कि उत्तर भारत में उनको बड़ी मान्यता मिली और उस समय के अच्छे-अच्छे विचारकों, विद्वानों और त्यागियों ने उन्हें अपूर्व सम्मान दिया।