सम्यक साधना के साधक आचार्य श्री

विक्रम सम्वत् 1982 में ग्रीष्मकाल का समय था। चारों ओर भयंकर आताप से सभी जीव दुःखी थे। पृथ्वी दिन में भीषण गर्मी के कारण आग उगलती सी महसूस हो रही थी। ऐसे समय में अचानक आसपास के ग्रामों में बिजली की तरह यह खबर फैली कि परम तपस्वी महान् ज्ञानी सन्त शिरोमणि आचार्य श्री शान्तिसागर जी छाणी बुन्देलखण्ड के तीर्थों की वन्दनार्थ आए हैं। आज जैसे सुलभ वाहन, साधन एवं सड़क मार्ग नहीं थे। जहाँ-जहाँ आचार्य श्री का पद विहार हो रहा था, ग्रीष्म ऋतु भी उनके पाद प्रक्षालन की भावना से असमय में वर्षा कर उनके अपार संयम-साधना का प्रभाव जीवों तक पहुंचा रही थी। वह एक ऐसा सुखद संयोग था जबकि मुनि श्री सूर्यसागर जी महाराज एवं मुनि श्री अनंत सागर जी के पद विहार की चरण राज से बन्देलखण्ड की भूमि धन्य हो रही थी। उस युग में मुनित्रय के दर्शनाथ नगर-नगर और गावँ-गावँ के श्रावक गण हजारों-हजारों की संख्या में आये और उन सन्तों की चरणरज मस्तक पर लगाकर धन्य हुए। आचार्य श्री शांतिसागर जी छाणी विद्वानों के प्रति तो अपार धर्मानुराग रखते थे।

मुनित्रय के बुन्देलखंड आने पर भक्तों ने उनकी भक्तिपूर्वक अगवानी की थी और प्रवास के दिनों में प्रतिदिन लगातार 8-8 घंटे तक अध्यात्म की चर्चा श्रावक और विद्वान गण करते रेहत थे। वह एक ऐसा समय था जब युगों युगों के बाद " निर्ग्रन्थ गुरुओं के दर्शनों, उनकी अमृतमय वाणी को सुनने का सौभाग्य बुंदेलखंड को प्राप्त हुआ था।