संस्मरण

विक्रम संवत् 1996 के पूर्व की घटना है मुनि श्री का मड़ावरा ग्राम में पदार्पण हुआ। एक दिन गाँव की पूरी एक परिक्रमा हो गई, लेकिन आहार विधि का योग किसी श्रावक के दरवाजे पर प्राप्त नहीं हो पा रहा। जैन दम्पति/परिवार के अन्य सदस्य "पड़गाहन” के लिए अपने-अपने द्वार पर खड़े होकर अनेक प्रकार से योग मिला रहे हैं। कहीं 3 कन्याएं तो कहीं 5 कन्याएं खड़ी हैं। कहीं दम्पत्ति सफेद वस्त्रों में तो कहीं पीली धोती में। कई कलशों की संख्या बदली जा रही है, तो कहीं भांति-भांति के सूखे फल थाल में लिए खड़े हैं। जितने लोग उतनी बातें परन्तु विधि नहीं मिली और मुनि श्री गांव की तीन परिक्रमा करके वापिस मंदिर जी में सामयिक में विराजमान हो गये। पूरे दिन का उपवास। दूसरे दिन फिर मुनिश्री आहार के लिए निकले। गाँव की एक परिक्रमा पूरी हो गई। लोग अवसाद में डूब गये कि ऐसी कौन सी कठिन प्रतिज्ञा मुनिवर ने ले ली है, जिसका योग/निमित्त नहीं मिल पा रहा है। तीसरी परिक्रमा के लिए वे मुख्य बाजार से होकर निकले। तभी एक नुकीले सींगों वाला बैल बाजार से गुजरा। बाजार में एक गुड़ की दुकान लगी थी और गुड़ की भेली का ढेर लगाये दुकानदार बेचने की तैयारी में जुटा था। अप्रत्याशित रूप से वह बैल उस दुकान से होकर गुजरा और जब गुड़ की भेली मुँह से न उठा पाया होगा तो उसे अपने नुकीले सींगों में फंसा कर दौड़ पड़ा, एक दूसरे रास्ते से।

देवयोग से मुनि श्री भी सामने से आ रहे थे और सींगों में गुड़ फंसा देखकर निकट श्रावक द्वार पर पड़गाहन के शब्द सुनकर रुक गये। लोगों की खुशी का पार नहीं रहा, जब उन्होंने मुनि श्री को श्रद्धा सहित पड़गाहन कर आहार दान का पुण्य लाभ लिया। आहार के पश्चात् लोगों ने बड़े आग्रह पूर्वक ली गई कठिन प्रतिज्ञा जानने की प्रार्थना की, जिसका दो दिन से योग नहीं मिल पा रहा था। मुनि श्री मुस्कराते हुए कहने लगे- योग तो साक्षात् आप सभी के सामने से गुजरा था। लोगों को बैल की घटना समझने में देर नहीं लगी। कितनी दुर्लभ प्रतिज्ञा। लेकिन जैन तपस्वी/मुनि “आहार" को भी कर्मों का की निर्जरा का निमित्त बनाते है। धन्य हैं ऐसे तपस्वी शान्तिसागर जी महाराज (छाणी) जिन्होंने "वसन' छोड़ दिये तो सारी वासनाएं भी गला दी।