संस्मरण

सन 1924 से 27 के बीच छाणी महाराज का पदार्पण चन्देरी में हुआ तो महाराज श्री ने पहिले ही दिन अपने प्रवचन में हिंसा-अहिंसा का विश्लेषण करते हुए पहली पंक्ति में बैठे श्रेष्ठ लोगों को खड़ा करके पूछा कि भाइयो! तुम्हारी कमीज, कुर्ते में लगे हुए ये बटन कैसे बनते हैं? श्रावकों ने उत्तर दिया महाराज जी यह हमें नहीं पता कैसे व किसके बनते हैं केवल चमकदार और कीमती होने के कारण हम लोग लगाते हैं, तब महाराज जी ने कहा भाइयो! ये बटन सीप के हैं। सीप एक जाति का कीड़ा है, जो नदियों में होता है, जब यह गर्भस्थ होता है, तभी इकट्ठा करके सीप के कीट बाहर न निकल पाएँ तभी मुलायम अवस्था में ही इन्हें चीर-काटकर बटन बना लिए जाते हैं। यह घोर पापमय हिंसाजन्य पदार्थ हैं, इसका त्याग करो। तभी सभी जैन व अजैन लोगों ने अपनी-अपनी कमीज और कुर्ते व जाकेटों के बटन तोड़कर फेंक दिये और कभी न लगाने की प्रतिज्ञा कर ली।

अब आया नम्बर “फेल्ट कैप” का यह वह टोपी है जिसमें मुलायम झूम अर्थात चमड़े की पट्टी लगाई जाती है, तब महाराज जी ने कहा; देखो अपनी-अपनी टोपियों को इसके भीतर क्या लगा है? महाराज श्री ने बताया यह जो पट्टी लगी है वह गर्भस्थ शिशु भेड़-बकरियों के गर्भ से ही प्राप्त मुलायम चमड़े की बनती है, यह घोर पाप का कारण है, इस टोपी को लगाकर आप लोग मंदिर भी जाते हैं, रोटी भी खाते हैं, आप लोग कैसे अहिंसक हैं? तत्काल सभी प्रबुद्ध जैनों ने टोपियाँ उतारकर फेंक दीं और कभी "फैल्ट कैप नहीं लगाने की प्रतिज्ञा कर ली, इसी प्रकार कमर में बांधे कमरपेटियों को भी निकलवा दिया और आजीवन चमड़े का परित्याग करा दिया।

छाणी महाराज ने अपने प्रवचन में देवदर्शन करना, रात्रि भोजन, कन्दमूल आदि के त्याग की बात कही, तो एक बालक उठ कर कहता है कि महाराज जी हम लोग बिना देवदर्शन किए पानी भी नहीं पीते, न ही रात्रि को भोजन करते हैं, सूर्यास्त से पूर्व ही "अन्थऊ" कर लेते हैं, फिर त्याग की क्या बात रही, कन्दमूल क्या है, हम नहीं जानते-तब महाराज श्री ने कन्दमूल की परिभाषा को समझाकर कन्दमूलों का त्याग कराया, त्याग की आवश्यकता को समझाते हुए रात्रि भोजन का त्याग कराया, देव दर्शन की प्रतिज्ञा दिलायी।

इसी क्रम में महाराज श्री ने कहा कि भाइयों! आप लोग जन्म से जैन हो । परम्परागत जैन संस्कारों को बड़ी मजबूती से पालते हो, पर आप लोग अभी जैन नहीं हो, जैन वे हैं, जो आठ मूलगुण को धारण करते हैं, वे आठ गुण- मद्य, मांस, मधु और पांच उदम्बर फलों का त्याग करने से माने जाते हैं। इन मूलगुणों को पाले बिना जैन नहीं, श्रावक नहीं, तब हाथ उठाकर सब लोगों ने प्रतिज्ञा की और सच्चे जैन श्रावक बन गये।