संस्मरण

विहार करते हुए आचार्य श्री शांतिसागर जी छाणी महाराज बीना पधारे। आचार्यश्री ने केशलोंच का निश्चय किया, समाज द्वारा ग्राम, नगरों में चिट्ठियां पंहुचा दी गई। अपार जन समूह ने केशलोंच देखी और दिगंबर मुनि की कठिन साधना, तपस्या का दर्शन किया।

उस समय अंग्रेजों का राज्य था, बीना जंक्शन रेलवे की सबसे बड़ी स्टेशन थी। अंग्रेजों से भरी एक ट्रैन वहां से गुजर रही थी, आचार्यश्री बीना स्टेशन के निकट ही केशलोंच कर रहे थे , कुछ अंग्रेज रेल को रुकवाकर जलसे को देखने आये। आचार्यश्री द्वारा हाथों से अपने सर के बालों को उखड़ते हुए देख कर अंग्रेज लोग अचंभित रह गए, अंग्रेजो ने कैमरे से फोटो भी खींचे और एक अंग्रेज इतना प्रभावित हुआ, कि मुनि चरणों में आकर बैठ गया और अपने कल्याण की भिक्षा मांगी, सभी लोग बड़ी दिलचस्पी से देख रहे थे, महाराज ने उसे अहिंसा की परिभाषा बताई और मांस न खाने की प्रतिज्ञा दिलाई। पंडित रतनचंद जी शास्त्री कहते हैं मुझे याद नहीं कितने अंग्रेजों ने नियम लिये पर एक अंग्रेज ने जीवन भर को मांस खाना छोड़ दिया था। बाकी अंग्रेज भाई खुशी मनाते हुए वापिस चले गये।

धन्य है बीना जैन समाज, जिसे दिगंबर साधु की एक आवश्यक और सबसे कठिन चर्या केशलोंच को कराने का पुण्य प्राप्त हुआ। हजारों भाइयों को भोजन आदि की अपूर्व व्यवस्था ही नहीं, बल्कि बैलगाड़ियों के बैलों को, घोड़ों और ऊंटों को भी दाना-पानी और चारे आदि की पूर्ण व्यवस्था की।