संस्मरण

तीर्थराज शिखर जी की यात्रा के बाद मुनिसंघ ने 1926 का चातुर्मास गिरिडीह में किया। आचार्यश्री अपने संघ को बहुत अनुशासन में रखते थे, संघ के हर सदस्य को संस्था आदि के लिए रूपये मांगने की मनाही थी, परन्तु समाज हित की संस्थाओं की स्थापना और सम्हाल करने का उपदेश देंगे और विद्यादान का महत्व श्रावकों को बतलायेंगे क्योंकि ये धर्म के अंग हैं। छापाखानों में हिंसामयी पदार्थों के उपयोग की वजह से छाणी महाराज ने छपे ग्रंथों को न छूने का नियम लिया था।

मुनि श्री छाणी महाराज ने श्रावकों को मुनि-दीक्षा देने से पहले खूब अच्छे से परख करते थे, और उन्हें तपाने के बाद ही दीक्षा देते थे, दीक्षा के पहले एक वर्ष तक अपने संघ में ‘अभ्यासी' के तौर पर रखने का उन्होंने नियम बनाया हुआ था। दीक्षार्थी की पात्र परीक्षा के इस नियम की सराहना सम्पूर्ण समाज करती थी।

विक्रम संवत् 1983 : सन 1926 में शिखरजी की वन्दना करने तक शान्तिसागरजी छाणी महाराज "मुनि' ही थे। यहाँ से चलकर इसी वर्ष गिरीडीह के चातुर्मास में उन्हें आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया।

आचार्य पद ग्रहण करने तक छाणी महाराज के उपदेशों से समाज में बहुत काम हो चुका था। उनके प्रभाव से राजस्थान में हिंसा और बलि का त्याग करने वाले अजैनों की संख्या सैंकड़ों तक पहुँच चुकी थी। मांसाहार और मद्यपान तथा हुक्का-तम्बाकू का त्याग तो हजारों की संख्या में लोग कर चुके थे। कन्या-विक्रय और छाती पीटकर रुदन-विलाप करने की प्रथा कई जगह बन्द हो चुकी थी उनके नाम पर अनेक स्थानों में कन्या विद्यालय जैन पाठशालाये छात्रावास तथा सरस्वती भवन आदि स्थापित हो चुके थे।