संस्मरण

“परमपूज्य चारित्र-चक्रवर्ती आचार्यश्री शान्तिसागरजी महाराज और आचार्य श्रीशान्तिसागरजी छाणी का विक्रम संवत 1990 का चातुर्मास ब्यावर में हुआ। इस चातुर्मास की सबसे बड़ी उल्लेखनीय बात यह थी कि दोनों संघ नसियाँजी में एक साथ ही ठहरे थे। छाणीवाले महाराज दक्षिण वाले महाराज को गुरुतुल्य मानकर उठते-बैठते, आते-जाते, उपदेशादि देने में उनके सम्मान-विनय आदि का बराबर ध्यान रखते थे, और दक्षिण वाले महाराज भी उन्हें अपने जैसा ही मानकर उनके सम्मान का समुचित ध्यान रखते थे। छाणीवाले महाराज अवसर पाकर प्रतिदिन दक्षिण वाले महाराज की नियमित रूप से वैयावृति करते थे।

नसियाँजी में पूजन, अभिषेक आदि तेरह पंथ की आम्नाय से होता है और दक्षिण वाले आचार्यश्री के अधिकांश व्यक्ति तथा दक्षिण से आने वाले दर्शनार्थी बीसपंथी आम्नाय से अभिषेक पूजनादि करते हैं, तब आचार्य श्री महाराज कहा करते थे कि, जहाँ जो आम्नाय चली आ रही हो, वहाँ उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये और सबको अपनी-अपनी श्रद्धा-भक्ति के अनुसार यह कार्य करना चाहिये।

जहाँ पर जिस प्रकार के व्यवहार का चलन हो उस प्रकार की प्रवृत्ति चलने देनी चाहिए उसमें अन्य परंपरा वालों को किसी मात्रा में भी ठेस नहीं पहुँचनी चाहिए, सहिष्णुता का भाव होना ही चाहिए, इस प्रकार का संकेत संघस्थ सबको बराबर दिया गया था।