शिखर जी की यात्रा

उत्तर भारत में दिगंबर परम्परा को पुनः जाग्रत करने वाले प्रशांतमूर्ति आचार्य श्री शांतिसागर जी छाणी महाराज, मुनि अवस्था में सन 1926 में पावन सिद्धक्षेत्र श्री शिखर जी की वंदना हेतु ससंघ कानपुर, लखनऊ, गोरखपुर, अयोध्या और बनारस आदि उत्तर प्रदेश के प्रमुख नगरों में विहार करते हुए शिखरजी की ओर बढ़ रहे थे, -"मुनिजी के आगमन के समाचार सुनकर श्रीशिखरजी बीसपंथी कोठी के मुनीम और हजारीबाग के जैन समाज के लोग भाव विभोर हो गए और वह सब शिखरजी से हाथी लेकर मुनिश्री की अगवानी के लिये उनके पास आये।

समाज जनों को हाथी के साथ देखकर मुनिश्री ने पूछा कि-"हाथी क्यों लाये हो?" तब समाजजनों ने बोला सौ-डेढ़ सौ वर्षों के बीच में यहाँ कोई मुनि महाराज नहीं आये हैं। इसलिये खुशी में और धर्म-प्रभावना को बढ़ाने के लिये हम श्रावकों ने आपकी आगवानी के लिए हाथी लाने का निर्णय किया है।

इस प्रकार पिछली अनेक शताब्दियों के ज्ञात इतिहास की यह पहली घटना थी जब कोई दिगंबर मुनि दूर से विहार करते हुए अपने संघ के साथ पर्वतराज की वंदना के निमित्त वहां तक पंहुचे थे। धन्य है ऐसे मुनिराज जिनके निमित से कई शताब्दियों बाद पुनः धर्म की पताका को फहराया।